बैनर से गायब मंडल अध्यक्ष—क्या ‘संगठन सर्वोपरि’ सिर्फ नारा?” “SC अध्यक्ष की अनदेखी या सियासी रणनीति? भाजपा में उठे बड़े सवाल” हरिद्वार की ज्वालापुर विधानसभा में भाजपा के अंदरूनी समीकरण एक बार फिर चर्चा में हैं।

बैनर से गायब मंडल अध्यक्ष—क्या ‘संगठन सर्वोपरि’ सिर्फ नारा?”

“SC अध्यक्ष की अनदेखी या सियासी रणनीति? भाजपा में उठे बड़े सवाल”

हरिद्वार की ज्वालापुर विधानसभा में भाजपा के अंदरूनी समीकरण एक बार फिर चर्चा में हैं।

पूर्वी मंडल में आयोजित स्वागत कार्यक्रम में कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक की मौजूदगी तो रही, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि मंडल अध्यक्ष को न तो कार्यक्रम की सूचना दी गई और न ही बैनर-पोस्टरों में उनकी तस्वीर दिखाई दी।

भाजपा खुद को संगठन आधारित पार्टी बताती है, जहां “अध्यक्षीय परंपरा” की बात अक्सर कही जाती है। ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या यह परंपरा अब सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गई है?

मामला तब और संवेदनशील हो जाता है जब यह चर्चा सामने आती है कि मंडल अध्यक्ष अनुसूचित जाति से हैं। क्या यह महज़ एक संयोग है या इसके पीछे कोई और राजनीतिक संदेश छिपा है? यही सवाल अब स्थानीय कार्यकर्ताओं और राजनीतिक गलियारों में तैर रहा है।

जिले के अध्यक्ष आशुतोष शर्मा और प्रदेश नेतृत्व की चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है। क्या यह अंदरूनी खींचतान है, या फिर किसी बड़े बदलाव की आहट?

फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने भाजपा की स्थानीय इकाई में असंतोष की चिंगारी को हवा दे दी है। अब देखना होगा कि पार्टी संगठन इस पर क्या रुख अपनाता है—क्या इसे नजरअंदाज किया जाएगा या फिर “संगठन सर्वोपरि” के सिद्धांत को फिर से ज़मीन पर उतारा जाएगा।

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