वाराणसी की प्रसिद्धसंस्था ‘‘सार्वभौम संस्कृतप्रचारसंस्थानम् ’’ ने ऑनलाईन आयोजित एक विशिष्ट कार्यक्रम में हरिद्वार, उत्तराखण्ड में स्थित भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय के सहाचार्य ‘‘डॉ. निरंजन मिश्र को ‘‘काव्यकल्पवल्ली’’ सम्मान से सम्मानित किया।

 

वाराणसी की प्रसिद्धसंस्था ‘‘सार्वभौम संस्कृतप्रचारसंस्थानम् ’’ ने ऑनलाईन आयोजित एक विशिष्ट कार्यक्रम में हरिद्वार, उत्तराखण्ड में स्थित भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय के सहाचार्य ‘‘डॉ. निरंजन मिश्र को ‘‘काव्यकल्पवल्ली’’ सम्मान से सम्मानित किया।
इस सभा की अध्यक्षता प्रो0 सुधारानी पाण्डेय भूतपूर्व कुलपति, उत्तराखण्ड संस्कृतविश्वविद्यालय, हरिद्वार, ने की। विद्वद्वरेण्य परमादणीय वासुदेव द्विवेदी शास्त्री की स्मृति में यह सम्मान प्रदान किया जाता है। डॉ. निरंजन मिश्र की अनवरत साहित्य साधना के परिणामस्वरूप उनको इस सम्मान के लिये चुना गया है। संस्कृत की विविध विधाओं में डॉ. मिश्र ने अपनी रचना से संस्कृत के प्रचार प्रसार में अपना अमूल्य योगदान दिया है।
इस ऑनलाईन कार्यक्रम में डॉ0 वाचस्पति मिश्र(अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ) प्रो0 रमाकान्त पाण्डेय , (केन्द्रिय संस्कृतविश्वविद्यालय, जयपुर परिसर,) प्रो0 धर्मदत्त चतुर्वेदी, (तिब्बती विश्वविद्यालय, सारनाथ, वाराणसी)डॉ0 सम्पदानन्द मिश्र (ऋषिकुल संस्कृतविश्वविद्यालय हरियाणा) डॉ0 शम्भू प्रसाद त्रिपाठी, डॉ0 शरदिन्दु त्रिपाठी, डॉ0 चन्द्रकान्तदत्त शर्मा (गोहाणा, मऊ,) डॉ0 अरविन्द तिवारी (बागपत, उत्तर प्रदेश) डॉ0 शैलेश कुमार तिवारी (उत्तराखण्ड संस्कृतविश्वविद्यालय, हरिद्वार) प्रो0 राजेन्द्र त्रिपाठी रससाज (इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज, उत्तरप्रदेश) आदि उपस्थित थे।
प्रो0 रमाकान्त पाण्डेय ने इस संस्कृतप्रचारिणी सभा के मूल उद्देश्य एवं परमादरणीय स्मरणावशेष पं-प्रवर वासुदेव द्विवेदी शास्त्री के चिन्तन का विवेचन करते हुए बताया कि डॉ0 डॉ. निरंजन मिश्र जैसे व्यक्ति वास्तव में संस्कृत साहित्य की विविध विधाओं में (महाकाव्य, खण्ड काव्य, लघुकाव्य, गद्यकाव्य, कवितासंग्रह, बालकविता, आदि) रचना करते हुए संस्कृत भाषा को जन जन तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं जो वास्तव में द्विवेदी जी के उद्देश्यों को पूरा करने में सहयोग कर रहा है। इनकी लेखनी इसी प्रकार संस्कृत के विकास और प्रसार के लिये दिनरात कार्य करती रहे, यही भगवान भोलेनाथ से प्रार्थना है।
कार्यक्रम अध्यक्ष प्रो0 सुधारानी पाण्डेय ने पं. वासुदेवद्विवेदी शास्त्री के लक्ष्य को विवेचित करते हुए बताया कि वर्तमान समय में अपनी लेखनी से संस्कृत जगत् को नित्य नवीन उपहार प्रस्तुत करनेवाले डॉ. निरंजन मिश्र को यह सम्मान प्रदान किया जाना वास्तव में सम्मान के गौरव को बढानेवाला है। वस्तुतः सम्मान का पात्र वही है जो अपने कार्यो से समाज को एक नई दिशा देने में समर्थ हो। समाज को अपनी संस्कृति के प्रति जागरूक करनेवाला हो। मिश्र की सभी रचनायें एक सामाजिक मूल्य को उपस्थापित करती है। मिथ्याचारिता भ्रष्टाचारिता से लड़ने के लिये सत्य का मार्ग प्रशस्त करती है। जन सामान्य को ध्यान में रखते हुए इनका साहित्य वास्तव में परमोपयोगी है जो सर्वदा सद्ज्ञान का प्रसार करती है।
डॉ- धर्मदत्त चतुर्वेदी ने डॉ. निरंजन मिश्र के सम्मान में अभिनन्दन पत्र का वाचन किया और डॉ- शरदिन्दु त्रिपाठी का कार्यक्रम का सम्यक् स×चालन किया।

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