पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलाधिपति स्वामी रामदेव महाराज ने राष्ट्रीय स्वर्णशलाका प्रतियोगिता के मेधावी छात्रों का 50 लाख रुपये की छात्रवृत्ति एवं पुरस्कार राशि देकर राष्ट्रीय प्रतिभाओं का किया सम्मान।

पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलाधिपति स्वामी रामदेव महाराज ने राष्ट्रीय स्वर्णशलाका प्रतियोगिता के मेधावी छात्रों का 50 लाख रुपये की छात्रवृत्ति एवं पुरस्कार राशि देकर राष्ट्रीय प्रतिभाओं का किया सम्मान।

हरिद्वार, 2 अगस्त। भारतीय ज्ञान परम्परा, संस्कृत एवं शास्त्रीय अध्ययन के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वारमें आयोजित राष्ट्रीय स्वर्णशलाका प्रतियोगिता (2026–27) का भव्य सम्मान समारोह गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। समारोह में देशभर के विभिन्न गुरुकुलों, विश्वविद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों से आए शास्त्रों के मेधावी विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र, सम्मान एवं छात्रवृत्तियाँ प्रदान कर उनका उत्साहवर्धन किया गया। 

इस अवसर पर स्वामी रामदेव जी महाराज ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि आज देश के समक्ष दो प्रकार की तस्वीरें दिखाई देती हैं।  “आज देश के सामने दो प्रकार के युवा दिखाई देते हैं। एक ओर ऐसे युवा हैं जो वेद, उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता, चरक संहिता, घेरण्ड संहिता और संस्कृत का अध्ययन एवं कण्ठस्थ कर भारत की सनातन ज्ञान परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जंतर-मंतर जैसे स्थानों पर विरोध-प्रदर्शन के नाम पर सड़कों पर उपद्रव, अराजकता और देश के नेतृत्व के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग देखने को मिलता है। यह भारत की संस्कृति नहीं है। भारत की संस्कृति मर्यादा, संवाद, शिष्टाचार और संस्कार की संस्कृति है। शास्त्रों का कण्ठस्थ अध्ययन कर भारतीय संस्कृति और सनातन ज्ञान परम्परा के संरक्षण का संकल्प निभा रहे हैं। यही भारत का वास्तविक स्वरूप है। पतंजलि विश्वविद्यालय एवं उससे जुड़े गुरुकुलों में हजारों युवा वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, चरक संहिता, घेरण्ड संहिता, योग, दर्शन और संस्कृत के अध्ययन एवं कण्ठस्थ करने में अपना जीवन समर्पित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पतंजलि का उद्देश्य युवाओं को केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि उन्हें संस्कृत, संस्कार, धर्म, दर्शन एवं भारतीय ज्ञान परम्परासे जोड़कर राष्ट्र के आदर्श नागरिक के रूप में विकसित करना है।” 

अपने संबोधन में न्यायमूर्ति गुरपाल सिंह आहलूवालिया ने पतंजलि योगपीठ एवं पतंजलि विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय संस्कृति, संस्कृत तथा शास्त्रीय शिक्षा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों की मुक्त कंठ से सराहना की। उन्होंने कहा कि आज जब विश्व भारतीय ज्ञान परम्परा की ओर आकर्षित हो रहा है, ऐसे समय में पतंजलि विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएँ राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। उन्होंने मेधावी विद्यार्थियों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि शास्त्रों का अध्ययन केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, नैतिकता और राष्ट्र निर्माण का आधार भी है।

राष्ट्रीय स्वर्णशलाका प्रतियोगिता में पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार, पतंजलि गुरुकुलम् (बालक वर्ग), हरिद्वार, पतंजलि कन्या गुरुकुलम्, हरिद्वार, पतंजलि आयुर्वेद कॉलेज, स्वामी दर्शनानन्द गुरुकुल महाविद्यालय, आचार्यकुलम्, हरिद्वार, आचार्यकुलम्, राँची, आचार्यकुलम्, चिरगाँव, आचार्यकुलम्, कुमारी कटरातथापतंजलि कन्या गुरुकुलम्, देवप्रयाग सहित अनेक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों ने सहभागिता कर भारतीय शास्त्रीय परम्परा का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।

राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न शास्त्रों में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में वेदभानु, साध्वी देववाणी, साध्वी देवांशी, कृष्णाशीष, जाह्नवी, अधिता, राशि, अंजलि, साक्षी तथा गौरिका को विशेष रूप से सम्मानित किया गया। वहीं संस्थागत प्रतियोगिताओं में दत्तात्रेय, आदर्श, ज्योति, देवार्पणा, ओजस, अधित, साध्वी देवदीक्षा, साध्वी देवनिधि, साध्वी देवसिद्धि, साध्वी देवस्मृति, निशा एवं देव कल्याणी सहित अनेक विद्यार्थियों को उनकी उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया।  समारोह का विशेष आकर्षण विभिन्न श्रेणियों में शास्त्रों का कण्ठस्थ अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के बीच लगभग 50 लाख रुपयेकी छात्रवृत्ति एवं पुरस्कार राशि का वितरण रहा। आयोजकों ने बताया कि यह पहल भारतीय ज्ञान परम्परा, संस्कृत एवं शास्त्रीय साहित्य के गंभीर अध्ययन को प्रोत्साहित करने तथा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

कार्यक्रम में मानविकी संकाय की अधिष्ठाता एवं दर्शन विभागाध्यक्ष साध्वी डॉ. देवप्रिया जी, डीन अकादमिक्स, ने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि पतंजलि विश्वविद्यालय एवं उसके गुरुकुलों में शिक्षा का लक्ष्य रोजगार के साथ-साथ राष्ट्रभाव, नैतिक मूल्यों, आध्यात्मिक चेतना और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का संकल्प विकसित करना है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यहां का प्रत्येक विद्यार्थी भारतीय संस्कृति का सच्चा प्रतिनिधि बनकर देश और विश्व में सनातन ज्ञान परम्परा का संदेश पहुँचाएगा। 

कार्यक्रम में पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार के प्रो-वाइस चांसलर प्रो. (डॉ.) मयंक अग्रवाल, डीन रिसर्च डॉ. ऋत्विक बिसारिया ,  परीक्षा नियंत्रक श्री ए. के. सिंह, विश्वविद्यालय के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, शोधार्थी, विभिन्न शिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। समारोह के अंत में सभी विजेता विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं सहभागी संस्थानों को बधाई देते हुए भारतीय ज्ञान परम्परा, संस्कृत, शास्त्रीय अध्ययन एवं सनातन संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के सामूहिक संकल्प को दोहराया गया। पूरे कार्यक्रम में भारतीय ज्ञान परम्परा, संस्कृत अध्ययन तथा संस्कारमूलक शिक्षा के प्रति उत्साह और गौरव का वातावरण देखने को मिला। इससे पूर्व पञ्चमी राष्ट्रीय स्वर्णशलाका प्रतियोगिता का शुभारम्भ 31 जुलाई को पतंजलि विश्वविद्यालय के मुख्य सभागार में हुआ। उद्घाटन समारोह में पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलाधिपति स्वामी रामदेव  महाराज,पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य बालकृष्ण सहित देशभर के अनेक प्रख्यात विद्वान, आचार्य, संत एवं गुरुजन उपस्थित रहे। भारतीय ज्ञान परम्परा, संस्कृत एवं शास्त्रीय अध्ययन के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से आयोजित इस पञ्चमी राष्ट्रीय शास्त्र स्मरण (स्वर्णशलाका) प्रतियोगिता में देशभर के विभिन्न गुरुकुलों, विश्वविद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।

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